गांव की मिट्टी की खुशबू, वहा की सादगी लोगों का अपनापन और खुला आसमान इन सबका अनुभव मैंने ‘चाफेरी’ गांव के वन भोजन में किया। मेरे लिए यह पहला मौका था जब मै इस तरह के आयोजन में शामिल हो रही थी। यह सिर्फ खाने-पीने का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि गांव की संस्कृति, लोगों की आत्मीयता और सामूहिकता, काम को समझने का अनमोल अवसर था। इस सफर ने मुझे न सिर्फ नए अनुभव दिए बल्कि यह एहसास भी कराया कि “गांव सिर्फ अपनापन नही देता है, बल्कि आपको अपना भी बना लेता है।”
सुबह की शुरुआत और सफर की रोमांचक धुन
उस दिन मैं बहुत उत्साहित थी। सुबह जल्दी उठी और “खंडाळा” के लिए निकल पड़ी, जहां से हम सभी एक-साथ वन भोजन के लिए जाने वाले थे। गांव के लोग, स्कूल के बच्चे और शिक्षकों का एक बड़ा समूह इकट्ठा हुआ था। थोड़ी ही देर में टेम्पो आया जिसमे सभी बैठे हुए थे। जब मै खड़ी थी तो सर ने मुस्कुराकर कहा बैठ जाओ बेटा।टेम्पो जैसे ही चल पड़ा सफर और भी खास बन गया। गांव के बच्चे अपनी मासूम हंसी और चंचलता के साथ सफर को आनंदमय बना रहे थे। कोई गाना गा रहा था तो कोई अपने दोस्तो से हंसी मजाक कर रहा था। टेम्पो की तेज रफ्तार और ताज़ी हवा का एहसास जैसे एक अलग ही खुशी दे रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे मैं भी अपने बचपन की दुनिया में लौट आई हूं।
कुछ देर बाद हम ‘कळझोंडी’ गांव पहुंचे। वहां एक डैम था, जिसे देखकर बच्चे खुशी से उछल पड़े। वे दौड़ते हुए वहा पहुंच गए। उनके चेहरों पर जो चमक थी, वह किसी अनमोल खजाने से कम नही थी। वही गांव की महिलाएं बिना किसी देरी के काम में जुट गई।
‘कळझोंडी’ गांव और बच्चो की उत्सुकता
खाने की तैयारी जब सबने मिलकर रसोई सजाई
टेम्पो से सामान उतारा गया और फिर अलग अलग काम बांटे गए। सुबह-सुबह से सफर में थे, इसलिए सबसे पहले पोहे और चाय बनाई गई धूप में बैठकर गरमागरम पोहे और चाय का स्वाद लेना अपने आप में एक अलग की अनुभव था। इस बीच, महिलाओं ने मिलकर सब्जियां काँटनी शुरू की कोई मटर छिल रहा था कोई गाजर काट रहा था तो कोई प्याज।
मैने देखा कि वहां हर कोई काम में लगा हुआ था लेकिन यह बोझ नही था, बल्कि एक साझेदारी थी। हर कोई अपनी तरफ से कुछ ना कुछ कर रहा था, और इसी आपसी सहयोग ने पूरे माहौल को खुशनूमा बना दिया था। गांव के लोग हर छोटी चीज को मिलकर करने मे विश्वास रखते हैं यही बात मुझे सबसे ज्यादा भा गयी।
बच्चो के साथ खेल और मस्ती
जहा महिलाएं खाना बना रही थी, तब मैंने बच्चों के साथ समय बिताने का सोचा। हमने कई तरह के खेल खेलें जिसमे ‘भाग-दौड़’, ‘लंगड़ी’, ‘गुड्डा बुड्ढी’ और ‘टग ऑफ वार’ शामिल थे। बच्चे पूरे जोश में थे, उनकी मासूमियत और ऊर्जा ने मुझे भी इन खेलों में शामिल होने पर मजबूर कर दिया। इन खेलों के दौरान, मैं भूल गई थी कि मैं एक बाहरी व्यक्ति हूं। बच्चो ने मुझे अपने बचपन की दुनिया में शामिल कर लिया था जहाँ न कोई चिंता थी, न कोई तनाव बस खुशी थी खेल था और ढेर सारी हंसी थीं।
सामूहिक भोजन और गांव की कहानियां
खेल कूद के बाद अब खाने का समय आ चुका था। महिलाओं ने मिलकर जो भोजन तैयार किया था। उसकी खुशबू पूरे वातावरण में फैल रही थी। आज के खाने में मसाला-भात, रायता, पापड़, और खीर थी। जैसे ही भोजन परोसा गया, सभी लोगों ने बड़े उत्साह से खाना शुरू किया। वहीं, जब महिलाएं खाने के बाद बाते कर रही थी, तो मैंने भी उनके पास बैठकर उनके जीवन की कहानियां सुनी। गांव की महिलाएं कितनी मेहनती होती है ना ? कितनी मुश्किलों से गुजरकर भी अपनी जिम्मेदारियो को हंसते हंसते निभाती है, यह सब सुनकर मेरा मन भर आया। उनके संघर्ष और आत्मनिर्भरता की कहानियाँ सचमुच प्रेरणादायक थी।
बच्चो की मासूम जिद और समुद्र की लहरों में खुशी
अब वापस जाने का समय आ चुका था। लेकिन बच्चों की आंखों में एक अलग ही चमक थी। उन्होंने अचानक सर से जिद शुरू कर दी। “सर, हमे समुद्र दिखाने ले चलो ना!” सर पहले मना कर रहे थे, लेकिन बच्चों के उत्साह और जिद को देखकर आखिरकार हामी भर दी गई। जैसे ही समुद्र पहुँचे, बच्चों की खुशी देखने लायक थी। वे लहरों के साथ खेल रहे थे, रेत पर दौड़ रहे थे, और अपनी ही दुनिया में मस्त थे। वहां मुझे एहसास हुआ कि गांव के बच्चे असली आज़ादी जीते हैं वे मोबाइल स्क्रीन मे नही बल्कि प्रकृति की गोद में खुश रहते हैं।
गांव का अपनापन और दिल को छू लेने वाली विदाई
अब लौटने का समय था। हम सब टेम्पो मे बैठें, लेकिन बच्चों की शरारते अभी भी जारी थी। जैसे-ही मै अपने ठिकाने पर उतरी, बच्चे जोर जोर से बोले “बाय दीदी! बाय दीदी!” उनकी वह आवाज मेरे दिल में बस गई।
उस दिन मैंने महसूस किया, कि मैं अब सिर्फ एक बाहर की लड़की नही हूँ, बल्कि इस गांव का हिस्सा बन चुकी हूँ।
“गांव अपनापन नही देता, वह आपको अपना बना लेता है।”
यह वन-भोजन मेरे लिए सिर्फ एक यात्रा नही थी, बल्कि एक अनुभव था, सीख थी, और यादों की पोतली थी। मैने गांव की संस्कृति को करीब से देखा, वहा के लोगो की आत्मीयता को महसूस किया और सबसे बड़ी बात गांव के अपनेपन को जिया।
“जीवन की असली खुशियां लक्जरी में नही, बल्कि गांव की मिट्टी की खुशबू और लोगो की हसीं में छुपी होती हैं।”







