Categories
Fellowship Hindi Blogs JSW Foundation Fellowship

माइग्रेशन (पलायन )

महामारी के दौरान बिहार में हो रहे माइग्रेशन(पलायन) के कई सारी खबरें हर दिन सुनने को मिलती थी लेकिन कभी इसे अपने आप को गुफ्तगू नहीं कर पाई। इससे गुफ्तगू ना होने के कई सारे करण रहे थे  कि स्थानांतरण हमने अपने आसपास नहीं देखा, केवल इसे अखबारों और न्यूज़ चैनलों में सुना करते थे। लेकिन कहीं ना कहीं मैंने इसे कोविड महामारी के दौरान गूगल पर जाकर माइग्रेशन क्या होता है? इसके क्या-क्या कारण रहे हैं? इसके बारे में मैं समझ बनाई थी लेकिन केवल खुद की जानकारी के लिए, मैंने इसे कभी खुद को जोड़ नहीं पाई थी।

मेरी यह समझ केवल समझने योग्य न हो उसे हम कैसे सामने से देख सकते हैं इसका भी एक अनुभव हमें मिला है| मैं जिसकी बात कर रही हूं वह है ‘माइग्रेशन (पलायन)’

जेएसडब्ल्यू फाउंडेशन फैलोशिप की चौथी ट्रेनिंग में कम्युनिटी मोबिलाइजेशन का एक सेशन था| जिस पर हमें कई सारे गतिविधि करने थे वह सेशन इस तरह से था कि हमारी ट्रेंनिंग पुणे, यशदा में थी और वहीं से 15 किलोमीटर दूर एक तालुका जिसका नाम था_ ‘चाकन’|चाकन तालुका एमआईडीसी.से भरा है अलग- अलग,बड़ी-बड़ी कंपनियां वहां पर है और वही एक चौक का नाम है ‘लेवर नाका चौक’।

एक संस्था है जो की लेवर के साथ उस इलाके में काम करती है उस संस्था का नाम है आजीविका ब्यूरो हमें संस्था के लोगों के साथ मिलकर के उस लेवर नाका चौक पर कम्युनिटी मोबिलाइजेशन कैसे करते हैं को सीखना था और उस पर समझ बनानी थी और वह संस्था किस प्रकार लेवर के साथ काम करती है इस पर समझ बनानी थी|

आजीविका ब्यूरो के हो रहे कार्य:

1.Legal Education And Aid (LEAD)

2.Collectivising Workers

3.Skill Training and Employment

4.Empowering Families affected by Migration

5.Knowledge Building through 6.Research and Advocacy

6.Social Compact

““सबूत बताते हैं कि भारत के लगभग 140 मिलियन ग्रामीण गरीब काम की तलाश में मौसमी रूप से शहरों, उद्योगों और खेतों की ओर पलायन करते हैं। ये वे प्रवासी हैं जो निर्माण, विनिर्माण, सेवाओं और कृषि क्षेत्र में व्यापक पैमाने पर आकस्मिक कार्य करते हुए आगे-पीछे आते-जाते रहते हैं। वे भारत के 350 मिलियन से अधिक असंगठित, अनौपचारिक कार्यबल का हिस्सा हैं, जो अपने ग्रामीण घरों और शहरी, औद्योगिक और ग्रामीण क्षेत्रों में अपने कार्यस्थलों पर श्रमिकों और नागरिकों के रूप में सेवाओं और अधिकारों से वंचित हैं।

श्रमिकों का आवागमन गरीब ग्रामीण क्षेत्रों से अधिक समृद्ध शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों की ओर होता है। यूपी, बिहार और झारखंड जैसे बाह्य-प्रवासन क्षेत्रों की ऐतिहासिक रूप से स्थापित सूची का विस्तार होकर इसमें राजस्थान, ओडिशा, मध्य प्रदेश जैसे राज्य भी शामिल हो गए हैं। यहां तक कि अधिक समृद्ध राज्यों में भी श्रमिकों का काफी अंतर-राज्य आंदोलन होता है। जबकि बड़े शहर और औद्योगिक समूह हमेशा प्रवासी श्रमिकों के प्रमुख आकर्षण रहे हैं, केरल जैसे राज्य लंबी दूरी के प्रवासियों के महत्वपूर्ण नियोक्ता बन गए हैं।””

https://www.aajeevika.org/labour-and-migration.php

कम्युनिटी मोबिलाइजेशन में क्या होना है कैसे क्या चीज करनी है की जानकारी हमारी फैसिलिटेटर एक दिन पहले ही दे दी थी और हमारा दूसरे दिन सुबह 7:00 बजे वहां जाने का समय था 

समय के अनुसार हम लोग पहले ही सुबह उठकर तैयार हो गए और हम और हमारे कुछ साथी उबर बुक कर चाकन के लेवर नाका चौक पहुंचे। इस चौक के बारे में उतनी जानकारी नहीं थी बस यह पता था कि चौक हम उसे ही कहते हैं ‘जहां चारों तरफ से रोड रहती हो।’

जब हम लोग वहां पर पहुंचे तो हमने देखा कि बहुतों की भीड़ लगी है|

किसी के हाँथ में टिफिन के डब्बे तो किन्हीं के हाँथ में फ़ोन और इधर- उधर दौड़ रहे है| सबके कद एक समान और जिसे देख आप यह कह सकते है की पैसे दो कम करवाओ। मैंने दुर्गा पूजा और दिवाली के मेले में भी इतनी भीड़ नहीं देखी थी तो कहीं ना कहीं मुझे भय लग गया कि यह क्या है| मैं जिस साथी के साथ जा रही थी मैंने उसका हाथ पकड़ा और दोनों साथ में चलने लगे वहां पहुंचने के बाद एक छोटे से ढाबे में हमने ब्रेकफास्ट किया और मैं जब तक ब्रेकफास्ट कर रही थी मेरे दिमाग में कुछ सवाल चल रहे थे।

•हम लोग यहां किससे बात करेंगे?

• क्या क्या बात करेंगे?

•क्या लोग इस भीड़ में हमें समझ पाएंगे भी कि नहीं कि मैं क्यों आई हूं यहां?

इसी सवाल के साथ हम वहां 8:30 तक पहुंचे|

पहुँचते ही आजीविका ब्यूरो संस्था की टीम से मुलाकात हुई| संस्था के टीम ने अपने कार्यों के बारे में हम लोगों को बताया। आजीविका ब्यूरो की टीम ने अपने चार चक्के वाली गाड़ी से वहां एक छोटी सी स्टॉल लगाने के लिए उन्होंने अपनी छतरी,मेज और कुर्सी निकाल और उस चौक के थोड़े किनारे में उन्होंने बैठा। जैसे ही वह बैठे वहां पर कई सारे लोग आने शुरू हो गए… अब हमारा काम था कि वहां जो भी लोग आ रहे हैं उनसे बातचीत करें, उनको समझे,  जिस प्रकार यह संस्था कम कर रही है उससे किस प्रकार लाभ ले पा रहे हैं इसके बारे में समझ बनाएं| हम लोगों ने एक-एक करके कई सारे मजदूर से घूम-घूम कर उस चौक पर बातचीत किए।

हमने उस चौक पर आजीविका ब्यूरो की  जो योजना के पर्ची थी वह भी लोगों को दिए और उनसे बात करते गये|

लोग उसे स्टॉल पर आते और अपने पैन कार्ड या जरूरत मंद कागजात को दिखाते और अपनी समस्याओं को रखते उन्हें किस प्रकार का लाभ मिला है संस्था अपने कार्यों के अनुसार सबका सहयोग कर रही थी | इस दौरान हमारी नजर हर एक झुंड पर पड़ी जहां पर एक जन ऐसे खड़े थे जिनके तन पर उजले कपड़े सर पर एक गमछा वह बाकियों से अलग दिख रहे थे|वह लोगों को कुछ ना कुछ बता रहे थे वहां जाने के बाद जब उनसे मिली तो यह समझ बनी थी कि वह लोग हैं जो इन सारे लोगों को कितने पैसों में आज लेवर का काम करना है का टेंडर लेते हैं, जो कंपनियों के द्वारा उन्हें भेजा जाता है वह वह लोग थे।

जैसे ही 9:00 बजे रोड का एक छोर दूसरे छोर  से दिखने लगा मजदूर कम हो गए बस,गाड़ियां आए लोग चढ़े जहां उन्हें मजदूरी के लिए जाना था वह वहां चले गए। मेरे दिमाग में यह सवाल बन रही थी कि बाकी जनों का क्या होगा यह क्या करेंगे?

इसी सवाल के साथ कुछ देर बाद आजीविका ब्यूरो की टीम से बातचीत हुई तो यह समझ बनी कि “यहां पर जितने सारे भी लेबर्स आते हैं वह अगर मान लीजिए कि वह सप्ताह में 7 दिन आए तो उन्हें 3 से 4 दिन ही किसी कामों में वह जाते हैं लेबर का काम करने के लिए बाकी दिन निश्चित है कि वह सात का सात  दिन कोई नहीं जाता है।” आजीविका ब्यूरो के द्वारा उसे किस प्रकार हर दिन के पैसे मिलते हैं के बारे में भी बताया गया ।

उन्होंने लेबरों से जुड़ा हुआ कई सारे योजनाएं कार्य बताएं साथ ही साथ वह अपने कार्यों को समुचित तरीके से बताएं हम लोगों भी उनके कार्यालय को भी देख कर पाए समझ पाए।

हमने अपने आसपास यह चीज बहुत सुनी है कि हमारे बाप, दादा बाहर कमाने के लिए गए हैं लेकिन बाहर क्या करते हैं किस तरह का काम करते हैं कभी इसके अंदर नहीं गए| वह महीने के आखिरी में पैसे आ जाना बस इसकी खबर मिलती है| लेकिन वह किस प्रकार का काम करते हैं इससे जुड़ना बहुत महत्वपूर्ण उस समय तो नहीं लगा था  लेकिन कहीं ना कहीं यह अनुभव होने के बाद लगा है कि जो पैसा हम महीने के आखिरी में घर पर देते हैं वह पैसा किस प्रकार आता है बहुत मायने रखता है और मुझे यह  कम्युनिटी मोबिलाइजेशन के सेशन के दौरान सीखने को मिला वह कई सारी चीज थी लोगों के भाव किस प्रकार वह अपने आप को मजबूत करके रखे हैं यह उनके चेहरे से दीखता था और मै इस भाव से बहुत नजदीक से जुड़ पाई।

वह तीन से चार दिन सप्ताह में काम करेंगे तो बाकी दिन वह उसे मंजिल की ओर जाना तो चाहते हैं लेकिन पास वाला व्यक्ति निर्णय लेता है कि आप जाएंगे कि नहीं और उसके बाद अपने आपको संतुष्ट करना कि आज हम नहीं जाएंगे यह एक बहुत बड़ी बात लगी मुझे।

अगर हम तीन से चार दिन काम कर रहे हैं तो फिर हम क्या करेंगे? मुझे एक चीज नया देखने को मिला था कि जो वह चौक था लेबर नाका वहां पर कई सारे लोग थे  थे जो की काम करने के लिए आए लेकिन जब उन्हें काम नहीं मिली तो वह फल, फूल कुछ छोटे-मोटे गिफ्ट्स को लेकर के चौक पर खड़े रहते थे|

मुझे कहीं ना कहीं यह अनुभव होने के बाद महसूस हुआ की  पैसे क्या होते हैं और पैसे का  महत्वपूर्ण किस प्रकार है इससे भी मैं जुड़ पाई। कहते हैं ना कि लोगों के पास क्रिटिकल थिंकिंग होनी चाहिए और वह थिंकिंग जो हम कर रहे हैं वह ना करके कुछ और भी हम क्या कर सकते हैं इस तरह के उदाहरण को ढूंढ कर रखना और जब मुझे वह विकल्प न मिले तो हम दूसरे विकल्प में कैसे पहुंच सकते है की सीख मिली मुझे।

*मैं जब आजीविका ब्यूरो की टीम से बात कर रही थी तो  बार-बार उनके मुंह में यह सवाल अधिक आ रहा था कि अधिक लोग जो माइग्रेट करते हैं वह हैं बिहार, मध्य प्रदेश, यूपी ,झारखंड और उत्तराखंड से है। | वह किस प्रकार माइग्रेट करते हैं और जब वह माइग्रेट करके जहां जाते हैं उनकी जिंदगी किस प्रकार होती है कि जब उन्होंने कहानी बताएं उसके दिनचर्या कैसे होते हैं? उसके खान-पान क्या होते हैं? उनके बाल -बच्चे परिवार किस प्रकार वहां रहते हैं तो वह सुनने को मिला जो की बहुत अलग था कि आप उसको महसूस कर पा रहे हैं कि उसका जीवन किस प्रकार व्यतीत हो रहा है।

मैं आजीविका ब्यूरो जैसे संस्था का के कार्यों का सराहनीय करती हूं कि अगर हम देश भर में देखें तो कई सारे ऐसे क्षेत्र हैं जहां पर हम आज के जीवन में कहते हैं कि हमें एक सस्टेनेबल जीवन जीना है तो हम किस प्रकार जिए उसके कई सारे करण रहे हैं |वह शिक्षा, महिला सशक्तिकरण हो या स्वस्थ हो,लेकिन आजीविका ब्यूरो जैसे संस्था जो की मजदूरों पर इस प्रकार काम कर रही है यह भी एक सराहनीय कार्य है और मैं इसका धन्यवाद अदा करती हूं |वाकई मुझे बहुत सीखने को मिला और इस तरह के अनुभव प्रदान करने के लिए मैं जेएसडब्ल्यू फाउंडेशन फ़ेलोशिप  के टीम को भी धन्यवाद देना चाहती हूं कि उन्होंने मुझे यह महसूस कराया की आप जब हर एक कदम लेते हैं तो उसमें किस प्रकार आपके पूरे शरीर आपका साथ देता रहता और वह शरीर को साथ देने में किस-किस तरह के संसाधनों की जरूरत होती है और वह कहां से मिलती है को हमने महसूस करवा पाए धन्यवाद आप सभी का।

Leave a comment